विशेष रिपोर्ट: पावर पब्लिकेशन स्टूडियो
लेखन एवं प्रस्तुति: नितिन ललितकुमार मणियार (वरिष्ठ
पत्रकार)
अखंड भारत की भौगोलिक सीमाएं भले ही समय के कठोर चक्र में
सिमट कर अंतरराष्ट्रीय रेखाओं में बंट गई हों, लेकिन जो हिंगलाज पर्वत कभी
हमारी अबाधित सीमाओं के भीतर था, वह आज बलूचिस्तान के दुर्गम पहाड़ों
में स्थित है। सदियों में भूगोल बदला, नदियाँ बदलीं और राजनीतिक नक्शे बदल गए, लेकिन
युगों-युगों से नहीं बदला तो केवल जगदम्बा का अपने भक्तों को दिया गया वह कालजयी
वचन।
आज गुजरात के कच्छ जिले में स्थित 'माता
नो मढ़' में हर वर्ष नवरात्रि और प्रमुख पर्वों पर लाखों श्रद्धालु माँ आशापुरा के
भव्य स्वरूप के समक्ष अपनी आस्था का शीश झुकाते हैं। लेकिन पत्रकारिता के अपने अट्ठाइस
साल के लंबे सफर और जमीनी हकीकत को करीब से देखने के बाद, मैंने
एक बड़ी आध्यात्मिक अज्ञानता को महसूस किया है। भक्त माँ आशापुरा के दर्शन तो अपार
श्रद्धा से करते हैं, परंतु उसी परिसर में मुख्य द्वार के ठीक सामने
स्थापित 'माँ हिंगलाज के मंदिर' तक बहुत कम लोग पहुँच पाते हैं। मेरा
यह आलेख उसी अज्ञानता को दूर करने और हमारी अनादि आर्य संस्कृति की धरोहर को
सहेजने का एक नम्र प्रयास है।
माता नो मढ़ स्थित हिंगलाज मंदिर का गूढ़ महत्व
- वही ईश्वरीय वचन, वही अक्षय पुण्य: जो
श्रद्धालु सरहद पार बलूचिस्तान के दुर्गम पहाड़ों तक नहीं पहुँच सकते, उनके लिए मढ़ स्थित माँ हिंगलाज का यह मंदिर कोई साधारण स्थान नहीं है।
यह उसी दिव्य वचन का साक्षात प्रमाण है, जहाँ माँ ने स्वयं घोषणा
की थी कि मढ़ में हिंगलाज स्वरूप की पूजा करने से बलूचिस्तान शक्तिपीठ के
दर्शन का ही पूर्ण फल प्राप्त होगा।
- मूल शक्ति का उद्गम केंद्र: माँ आशापुरा वास्तव में माँ हिंगलाज का ही
द्वितीय प्राकट्य हैं। इसलिए, मढ़ में माँ हिंगलाज के
दर्शन किए बिना आशापुरा माता की यात्रा और दर्शन अधूरा ही माना जाता है।
- अलौकिक शांति एवं ऊर्जा: जो परम आध्यात्मिक शांति बलूचिस्तान के हिंगलाज
मंदिर की गुफा में महसूस होती है, वही अलौकिक चैतन्य ऊर्जा
मढ़ स्थित हिंगलाज मंदिर की दिव्य आरती में साक्षात अनुभूत की जा सकती है।
सरहद पार 'नानी माँ' और
सर्वधर्म समभाव का अनूठा संदेश
माँ हिंगलाज की महिमा और चमत्कार केवल हिंदू धर्म या
भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। आज भी बलूचिस्तान के हिंगलाज शक्तिपीठ में मजहब
की तमाम दीवारें ढह जाती हैं। स्थानीय बलोच मुस्लिम समुदाय माँ हिंगलाज को अत्यंत
आदर और अगाध आस्था के साथ 'नानी माँ' कहकर
पुकारता है। उनके लिए यह पावन स्थल 'नानी मंदिर' है
और यहाँ की कठिन यात्रा को वे 'नानी की हज' के
रूप में मानते हैं।
यदि आज भी कोई श्रद्धालु बलूचिस्तान स्थित मूल शक्तिपीठ की
यात्रा पर जाता है, तो यही बलोच मुस्लिम समुदाय पूरी निष्ठा, सुरक्षा
और सम्मान के साथ उन्हें दुर्गम पहाड़ों से गुजारकर मंदिर तक ले जाता है। वे इस
तीर्थस्थल और यहाँ आने वाले यात्रियों की रक्षा अपने प्राणों से भी बढ़कर करते
हैं। यह प्रसंग पूरे विश्व को एकता, सौहार्द और मानवता का सबसे बड़ा संदेश
देता है।
आखिर मढ़ में हिंगलाज मंदिर क्यों स्थापित हुआ? (प्राचीन
इतिहास के पन्नों से)
इस अलौकिक संबंध को समझने के लिए हमें प्राचीन इतिहास, चारणी
साहित्य और रुद्रयामल तंत्र जैसे प्राचीन ग्रंथों के संदर्भों की ओर लौटना होगा:
- राजा की निस्वार्थ पुकार: आधुनिक परिवहन, पक्की सड़कों और विश्राम
गृहों के अस्तित्व में आने से युगों पूर्व, अखंड भारत के एक परम भक्त
राजा ने बलूचिस्तान स्थित सर्वोच्च हिंगलाज शक्तिपीठ की अत्यंत कठिन यात्रा
प्रारंभ की। कच्चे, पथरीले और तपते रास्तों पर हफ्तों
का राशन-पानी लादकर वे हिंगलाज पर्वत की गुफा तक पहुँचे और कठोर अनुष्ठान
किया। माँ हिंगलाज ने प्रसन्न होकर राजा को वरदान मांगने को कहा।
- कलयुग की चिंता और माँ का वरदान: राजा ने अपने लिए धन या साम्राज्य न
मांगकर पूछा,
"हे माँ! मैं तो राजा था, इसलिए संसाधनों के साथ यहाँ पहुँच गया। परंतु संसाधनों से वंचित आपका
साधारण भक्त कलयुग में इस भीषण मार्ग को कैसे पार करेगा? यदि भविष्य में भारतवर्ष की सीमाएं सिकुड़ीं और अखंड भारत का स्वरूप
परिवर्तित हुआ, तब आपके भक्त आप तक कैसे
पहुँचेंगे?"
- अमर घोषणा: भक्त की इस करुणाभरी पुकार पर माँ हिंगलाज ने द्रवित होकर
वरदान दिया,
"हे राजन! समय के साथ मैं स्वयं इस असंभव दूरी
को पाट दूंगी। कच्छ के 'मढ़' गांव में मेरा प्राकट्य होगा, जहाँ मुझे 'आशापुरा'
(मनोकामना पूर्ण करने वाली माँ) के रूप में पूजा जाएगा।
जो भक्त बलूचिस्तान नहीं पहुँच पाएंगे, वे मढ़ में मेरी पूजा करके
वही अक्षय पुण्य प्राप्त करेंगे।"
देवचंद की कथा: जब ईश्वरीय वचन भूमि पर फलीभूत हुआ
- पंद्रह सौ साल पूर्व का चमत्कार : मारवाड़ के
सेठ देवचंद जब व्यापार हेतु कच्छ आए, तो संतान प्राप्ति की
तीव्र अभिलाषा में वे नवरात्रि के दौरान इसी स्थान पर कठोर साधना में लीन हो
गए। माँ आशापुरा ने स्वप्न में मंदिर निर्माण का आदेश दिया और शर्त रखी कि छह
महीने तक मंदिर के कपाट बंद रहेंगे।
- समय से पूर्व खुले कपाट: कुछ ही महीनों बाद बंद कपाट के भीतर से दिव्य
घुंघरुओं और देव संगीत की ध्वनि गूँजने लगी। उत्सुकता में देवचंद ने समय से
पूर्व कपाट खोल दिए। माँ अभी पूर्ण रूप से प्रकट हो ही रही थीं, इसलिए उनकी प्रतिमा घुटनों के बल बैठी हुई आधी उठी मुद्रा में ही स्थापित
रह गई। आज भी लाखों भक्त माँ के इसी अद्भुत स्वरूप की पूजा करते हैं।
- साम्राज्यों की अटूट श्रद्धा: 9वीं शताब्दी में सम्मा
राजपूत वंश और 16वीं शताब्दी में जाडेजा राजवंश के
जाम रावल तथा जाम खेंगारजी माँ के परम भक्त बने। आज भी कच्छ के महाराव परंपरा
अनुसार नवरात्रि में यहाँ शाही चामर पूजा संपन्न करते हैं।
विश्वभर के श्रद्धालुओं से एक नम्र अपील
एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में मेरी दुनिया भर के तमाम
श्रद्धालुओं और माँ के भक्तों से यही हार्दिक अपील है कि जब भी आप कच्छ के माता नो
मढ़ जाएं, तो केवल माँ आशापुरा के मुख्य मंदिर में मस्तक टेककर न लौटें। उनके ठीक सामने
स्थित माँ हिंगलाज के दिव्य मंदिर में अपना शीश अवश्य झुकाएं और वहाँ कुछ क्षण
ध्यान लगाएं।
वही वह पावन स्थल है जहाँ अखंड भारत की आध्यात्मिक चेतना और
माँ हिंगलाज का अमर वचन साक्षात स्पंदित हो रहा है। हिंगलाज और आशापुरा वस्तुतः एक
ही जगज्जननी शक्ति के दो दिव्य स्वरूप हैं।
बोलो हिंगलाज मात की जय!
बोलो आशापुरा मात की जय!
"बलूचिस्तान से लेकर मढ़ तक की यह
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा आपको कैसी लगी, कमेंट करके
ज़रूर बताएं।" 'जय माता दी' लिखकर अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज कराएं!
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अखंड भारत की इस अनमोल धरोहर और माँ के अमर वचन को अधिक से
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जय माँ हिंगलाज! जय माँ आशापुरा!
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Date: October 08, 2026
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